वृंदावन का गौरव: कैसे हुई प्रेम मंदिर की स्थापना

यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पिछले डेढ़ दशक में प्रेम मंदिर केवल वृंदावन ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भक्ति और भारतीय आर्किटेक्चर का एक बेजोड़ प्रतीक बन गया है। वर्ष 2012 में उद्घाटन के बाद से इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ी है और आज यहाँ प्रतिदिन देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं।

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Sartaj Singh
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प्रेम मंदिर का उद्घाटन 2012 में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा किया गया

यह अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पिछले डेढ़ दशक में प्रेम मंदिर केवल वृंदावन ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भक्ति और भारतीय आर्किटेक्चर का एक बेजोड़ प्रतीक बन गया है। वर्ष 2012 में उद्घाटन के बाद से इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ी है और आज यहाँ प्रतिदिन देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं।

वृंदावन की पावन भूमि सदियों से भक्ति की धारा बहाती रही है। उसी भूमि पर निर्मित प्रेम मंदिर को इस युग के पाँचवें मूल जगद्गुरु –जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज के संकल्प का साकार रूप माना जाता है।

1946 में जगद्गुरु जी का संकल्प

प्रेम मंदिर का विचार अचानक नहीं आया। बताया जाता है कि 1946 में, जब श्री कृपालु जी महाराज मात्र 24 वर्ष के थे, तब उन्होंने वृंदावन में एक भव्य मंदिर बनाने का संकल्प लिया था। उस समय यह विचार असंभव-सा प्रतीत हुआ, परंतु समय के साथ दुनिया ने देखा कि कैसे एक महापुरुष के संकल्प ने विराट रूप धारण कर लिया।

प्रेम मंदिर की आधारशिला 14 जनवरी, 2001 को रखी गई। यह तिथि अपने आप में ऐतिहासिक थी, क्योंकि 14 जनवरी, 1957 को काशी विद्वत् परिषत् ने श्री कृपालु जी महाराज को जगद्गुरु की मूल उपाधि से विभूषित किया था। ठीक 44 वर्ष बाद, उसी दिन, प्रेम मंदिर का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ। अगले ग्यारह वर्षों तक हजारों कारीगरों ने दिन-रात परिश्रम करके इस स्वप्न को वास्तविकता में बदला।

प्रेम मंदिर के संस्थापक जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

भारतीय आर्किटेक्चर का बेजोड़ प्रतीक

मंदिर का निर्माण प्राचीन भारतीय स्थापत्य शैली में किया गया है। लगभग 30,000 टन श्वेत इटैलियन संगमरमर से निर्मित यह मंदिर अपनी बारीक नक्काशी और भव्य संरचना के लिए प्रसिद्ध है। पत्थरों पर उकेरी गई श्री राधा-कृष्ण की मधुर लीलाएँ और कलात्मक आकृतियाँ दर्शनार्थियों को भारतीय शिल्प परंपरा की समृद्धि का अनुभव कराती हैं।

जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज भक्त समाज में अपने धारा-प्रवाह प्रवचनों के लिए जाने जाते हैं। वेद, पुराण, भागवत, गीता आदि के प्रमाण देते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया कि बिना किसी संसारी कामना के भगवान् के श्री चरणों में प्रेम करने से ही परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव है। श्री कृपालु जी प्रेम की प्रैक्टिकल साधना का उपदेश देते और भजन-कीर्तन के माध्यम से साधकों का मन भगवान् की और मोड़ देते।

आज भी वृन्दावन, बरसाना और श्री कृपालु धाम मनगढ़ में उनके आश्रम चल रहे हैं जहाँ वर्ष में कई बार रूपध्यान संकीर्तन साधना शिविर आयोजित किये जाते हैं। इन शिविरों में जन-सामान्य भाग लेकर इसका लाभ ले सकते हैं। आज भी विश्व के लाखों लोग इस साधना द्वारा श्री राधा-कृष्ण से अपना प्रेम बढ़ा पा रहे हैं।

 प्रेम मंदिर में क्यों जुटते हैं लाखों श्रद्धालु

जगद्गुरु कृपालु जी का कृपा-प्रसाद है कि प्रेम मंदिर में रोज़ लाखों श्रद्धालु मन में भक्ति भाव और भगवान् के दर्शन की कामना लेकर आते हैं। जन्माष्टमी, दीपावली, नए साल आदि त्योहारों पर तो यहाँ भक्तों का जन सैलाब देखते ही बनता है।

हाँलाकि प्रेम मंदिर से जुड़े लोगों की मानें तो उन्हें इतनी भीड़ देखकर कोई आश्चर्य नहीं होता। उनका कहना है कि प्रेम मंदिर की आधारशिला रखते समय जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने यह घोषणा की थी कि यह मंदिर वृन्दावन का गौरव बढ़ाने का कार्य करेगा और जो भी वृन्दावन आएगा उसे प्रेम मंदिर अवश्य आना पड़ेगा।

आज जब वे लोग श्री कृपालु जी के वचनों को साकार होते हुए देखते हैं तो उनका मन भक्ति एवं समर्पण की भावना से ओत-प्रोत हो जाता है। जिन लोगों से हमने बात की, उनका कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो मंदिर के गर्भ गृह में स्थित श्री राधा-कृष्ण और श्री सीता-राम की मूर्तियाँ जीवंत हैं।

विद्युत् की रौशनी से स्नान किये हुए प्रेम मंदिर की छटा रात्रि के समय देखते ही बनती है। जब मंदिर परिसर में स्पेशल म्यूजिकल फव्वारे पर श्री राधा-कृष्ण का नृत्य दिखाया जाता है, तो लोग अवाक रह जाते हैं। रात के समय मंदिर परिसर में लगी गोवर्धन-धारण, कालिया-नाग मर्दन आदि की झाकियाँ सजीव हो उठती हैं, जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।

JKP अध्यक्षायें — सुश्री डॉ. विशाखा त्रिपाठी जी, सुश्री डॉ. श्यामा त्रिपाठी जी और सुश्री डॉ. कृष्णा त्रिपाठी जी — प्रेम मंदिर में एक वितरण कार्यक्रम के दौरान

कौन करता है प्रेम मंदिर का संचालन

प्रेम मंदिर के निर्माण और इसके कुशल प्रबंधन में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की तीनों सुपुत्रियों एवं जगद्गुरु कृपालु परिषत् (JKP) की अध्यक्षाओं — सुश्री डॉ. विशाखा त्रिपाठी जी, सुश्री डॉ. श्यामा त्रिपाठी जी और सुश्री डॉ. कृष्णा त्रिपाठी जी — की प्रमुख भूमिका है।

इनके नेतृत्व में जगद्गुरु कृपालु परिषत् एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी और धर्मार्थ संगठन के रूप में कार्यरत है, जो न केवल प्रेम मंदिर के निर्माण की देखरेख करता है, बल्कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे अनेक नि:शुल्क मानवीय कार्यों का भी संचालन करता है। प्रेम मंदिर के 11 वर्षों के निर्माण काल के दौरान, उन्होंने हज़ारों कुशल कारीगरों और स्वयंसेवकों के प्रयासों को प्रेरित किय।

इन तीनों अध्यक्षाओं ने यह सुनिश्चित किया है कि मंदिर आने वाले लाखों श्रद्धालुओं को आत्मीयतापूर्ण अनुभव प्राप्त हो। उन्होंने परिसर के भीतर आधुनिक सुविधाओं जैसे कि कैफे, बुक स्टॉल और सूचना केंद्रों का उत्कृष्ट ढाँचा तैयार किया है।

पिछले 14 वर्षों के दौरान प्रेम मंदिर ने वृंदावन की अर्थव्यवस्था और पर्यटन पर भी गहरा प्रभाव डाला है। होटल, परिवहन और स्थानीय व्यवसायों को इससे नई ऊर्जा मिली है। अनेक श्रद्धालु यहाँ आकर आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं और साथ ही स्थानीय संस्कृति से जुड़ते हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज का प्रेम मंदिर अब वृंदावन की पहचान बन चुका है।

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